यकायक चांदनी चमकी यकायक बर्क लहराई
न जाने किस दरीचे से मुहब्बत की महक आई
ये किस्मत के तमाशे है करो ना यूं गिले शिकवे
बदलती है न तक़दीरें ख़ुदाने जो है लिखवाई
मुझे संगदिल तू कह लेकिन तुझे भी मानना होगा
मेरेही पास आ-आकर कटेगी तेरी तनहाई
है दर्दो-ग़म के मारे और हैं हम भीड में तनहा
हमे महंगी पडी आखिर वो ज़ालिम से शनासाई
कभी उस शख्स के बारे में अच्छी बात भी कह दो
नही रिश्ता रहा लेकिन बनो इतने ना हरजाई
ग़ज़लसरा - भैरवी कदम देव Gazal Bhairavi
ग़ज़ल - दिलीप पांढरपट्टे Dilip Pandharpatte
सारंगी - उस्ताद लियाकत अली खान
Ustad Liyakat Ali Khan
गिटार - मिलिंद शेवरे Milind Shevre
तबला - समीर शिवगार
मोसीकर - सुधाकर कदम Sudhakar Kadam
कार्यक्रम संयोजक - निषाद कदम Nishad Kadam
आयोजक - आचरेकर प्रतिष्ठान,कणकवली.१.१.११
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