गझल

माझी मराठी गझल गायकी

मराठी गझल गायकीला तशी कोणतीही परंपरा नाही.माझ्या अगोदर मराठी गझल,गझलसारखी गाण्याचा फ़ारसा प्रयत्न कोणीच केला नसल्यामुळे मराठी गझल गाणे हे माझ्यासाठी आव्हान होते.मराठीमध्ये गझल जशी उर्दूकडून आली तशीच मराठी गझल गायकीही उर्दू गझल गायकांकडून उचलावी लागली.माझी गायकी किंवा ढंग हा पाकिस्तानचे मेहदी हसन,फ़रिदा खानम,गुलाम अली व आपले जगजीत सिंग ह्यांच्या गायकीवरुन तयार झाला आहे.त्या काळात विदर्भातील यवतमाळ जिल्ह्यातील आर्णी सारख्या आडवळणी गावात वरील गायकांच्या ध्वनिमुद्रिका सुध्दा मिळत नव्हत्या.पाकिस्तान रेडिओवरुन जे काही ऐकायला मिळायचे त्यावरुन मला जेवढे शिकता येईल तेवढे शिकत गेलो.पुढे स्व.सुरेश भटांनी मला मेहदी हसन,फ़रीदा खानम, यांच्या ध्वनिफ़िती दिल्या.हळूहळू गुलाम अली,जगजीत सिंग,बेगम अख्तर यांच्याही गायकीचा अभ्यास करुन मी माझा वेगळा असा बाज निर्माण केला. (पृष्ठ क्रमांक क्लिक केल्यास एक- एक पृष्ठ आपल्याला वाचता येईल)

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Wednesday, April 1, 2026

राग-रंग - बिलासखानी तोडी

 

                           (लेखांक १३)

                  #राग #बिलासखानी_तोडी 

     दक्षिण भारत के संगीत तज्ञ कहते हैं कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को कुछ मुस्लिम संगीतकारोंने बिगाड़ दिया है, तो कुछ मुस्लिम संगीतकारोंका कहना यह है कि मुस्लिम संगीत तज्ञों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को सजाया और उसे और ज्यादा खूबसूरत बनाया।

     अगर इतिहास देखा जाये तो भारतीय बेपारियों के अरबी बेपारीयोंसे सैंकडों सालोंसे बेपार से संबंधित रिश्ते जुड़े हुए हैं। हजरत मोहम्मद के जनम से भी पहले कुछ अरबी ग्रंथ रामपूर के 'रजा पुस्तकालय' में सुरक्षित हैं, उन में कुछ विशिष्ट गीतों की स्वरलिपी भी है, जो साम गायन करनेवाले 'गात्रबिना' विधी से प्रभावित है। इससे यह समझ में आता है कि अरब लोग इस्लाम का उदय होने से पहले भारतीय स्वरविधीसे परिचित थे। दक्षिण भारत से तो अरबी बेपारियों का संबंध बहुत पुराना है। इसवी सन 868 में जाहज नामक एक अरबी लेखक ने भारतीय संगीत की भरपूर तारीफ की है। इसमें खास करके 'एक तारा' याने 'एक तंत्री बिना' से संबंधित चर्चा बहुत महत्वपूर्ण समझी जाती है। स्पेन के इतिहासकार काझी साहूद उदलूसमी ने, जिसमें रागों के स्वरों का वर्णन है, ऐसे भारतीय ग्रंथ हम तक पहुंचावे, ऐसा जिक्र इसवी सन 1017 में किया है। (संदर्भ: अरब और हिंद के तालुकात, लेखकः सय्यद सुलेमान नदवी, हिंदुस्तानी अकॅडमी, पृष्ठ 157) अमीर खुसरो ने भारतीय संगीत पुरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है ऐसा कहा है। (संदर्भ: अरब और हिंद के तालुकात, लेखकः सय्यद सुलेमान नदवी, हिंदुस्तानी अकॅडमी, पृष्ठ 158) भारतीय संगीत सीखने के लिए विदेशसे कई विद्यार्थी भारत जाते रहते थे, ऐसा जिक्र 'खिलजीकालीन भारत' इस संथ के पृष्ठ क्रमांक 180 पर है। इसवी सन 753 से लेकर 774 के बौचवाले समय में कई भारतीय ग्रंथ जरबस्थान ले जाकर उनका अरबी भाषा में अनुवाद किया गया। उस समय बगदाद में खलिफा मन्सूर का शासन था। खलिफा हारून के (786 से लेकर 808) इस समय में कई अरब विद्यार्थीयोंको विभिन्न विद्याओंके अध्ययन के लिए भारत भेजा गया और भारत के विद्वानों को बगदाद बुलाया गया। प्रसिद्ध संगीत तज्ञ शेख बहाउद्दिन झकेरिया का संगीत संप्रदाय अरबी संगीत के प्रभाव में था। झकेरिया सुफी के सुहरवर्दी परंपरा के महापुरुष थे। उनका कार्यक्षेत्र सिंध प्रांत होने के कारण पंजाब और सिंध के लोकगीतों का इस संप्रदाय पर पूरी तरह से प्रभाव था। खैबर घाटी से आये हुए मुसलमान और अरबस्तान से आये हुए मुसलमान इन दोनों के स्वभाव, चरित्र और संगीत में बहुत बड़ा फर्क था। चाहे दोनों के धार्मिक संबंध थे, लेकिन सांस्कृतिक संबंध बिलकुल भी नहीं थे। अरबी संगीत और इरानी संगीत पूरी तरह अलग अलग है। अमीर खुसरो को इसका ग्यान था। इरानी संगीत के चार 'उसूल' और 'बारा परदों का' अभ्यास करने के बाद भी उसने भारतीय संगीत को ही सर्वश्रेष्ठ माना है। चिस्ती परंपरा के प्रसिद्ध पुरुष शेख निजामुद्दीन विस्ती के दर्गा पर खुसरो की जो रचनायें गाई जाती हैं, वे सब भारतीय लोकधून पर आधारित शुद्ध भारतीय है। (संदर्भ: संगीत चिंतामणी)

     अकबर के दरबार में ग्वालियर परंपरा के मर्मज्ञ और साथ ही फारसी परंपरा के विदेशी कलाकार भी थे। उस समय की परिस्थिती संगीत में नये नये प्रयोग करने के लिए बहुत ही अनुकूल थी। ऐसा अबुल फजल के 'आईने अकबरी' के लिखापढी से समझ आता है।उस समय संगीत में कई प्रयोग हुए और इन्ही प्रयोगों से ही तानसेन का मिया मल्हार, दरबारी कानडा इन रागोंका उदय हुवा। कई प्रयोग हुए और इन्ही प्रयोगों से ही तानसेन का हुवा। (कानडा यह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के रागों  का समूह है,जिसे कान्हडा इस नाम से भी पहचाना जाता है। कानडा यह नाम कर्नाटक रागों का समूह है, जिसे कान्हडा इस नाम से संगीत परंपरा और कन्नड देश से आया होगा ऐसा लगता है। इस समूह के राग अलग अलग ठाटोंके हैं लेकिन विशेष करके आसावरी या काफी ठाटके है।। कानडा के कुल मिलाकर 18 प्रकार माने जाते है। उसमें शाम कानडा, मंगल कानडा, कोलाहल कानडा, मुद्रिक कानडा, नागध्वनी कानडा, टंकी कानडा, जैजवंती कानडा, गारा कानडा, काफी कानडा, बागेश्री कानडा, सुधराई कानडा, सुहा कानडा, शहाणा कानडा, अडाणा कानडा, हुसैनी कानडा, अभोगी कानडा, कौशी कानडा, नायकी कानडा ये प्रकार है। इसमें से कई प्रकार आज नामशेष हो चुके हैं।)

     'मियां की तोडी' (गुजरी या गुर्जरी तोडी, देसी तोडी, हुसैनी तोडी, आसावरी याने कोमल ऋषम आसावरी ऐसे तोडी के कई प्रकार प्रसिद्ध हैं।)

     धोंधू का 'धोंधू की मल्हार', चरजुका 'चराजू की मल्हार', (मेघ मल्हार, रामदासी मल्हार, गौड मल्हार, सुर मल्हार, देस मल्हार, नट मल्हार, धुलिया मल्हार, मीरा की मल्हार ऐसे मल्हार के भी कई प्रकार है।) इस प्रकार से नये नये राग संगीत जगत को मिलते गये और यह परंपचा आगे भी कायम रही।

    (मैंने भी भारतीय शास्त्रीय संगीत में न होनेवाली एक नयी सुरावट में मराठी गझल स्वरबद्ध की है। इस राग को 'सुधाकरी तोडी' ऐसा नाम दिया है।

ठाट - भैरवी

वादी स्वर - रिषभ

संवादी स्वर - पंचम

गान समय - दिन का पहला प्रहर

आरोह सा कोमल, रे कोमल, ग प कोमल,निसां

अवरोह- सां कोमल, नि प कोमल, ग कोमल,रेसा

आरोह और अवरोह में पांच स्वर होने के कारण शास्त्र के अनुसार इसकी जाती औडव औडव हो जाती है।


(इसे मान्यता मिलेगी या नहीं, मुझे पता नहीं क्यूंकि मैं शास्त्रीय संगीत का पंडित, डॉक्टर, प्राध्यापक या किसी महाविद्यालय का संगीत विभाग प्रमुख नहीं हूं।)

शब्द है...

'माझी गझल गुलाबो भरते हसून प्याला, 

माझ्या नशेत अवघा जातो बुडून प्याला'

रसिकोंको सुनने के लिए यूट्यूब लिंक

https://youtu.be/hRVkLxUFU ng?si=Vk 6p5c2ZdwSPYPT

     जहांगीर के समय में तानसेन का बेटा बिलासखान ने 'बिलासखानी तोडी' नाम के एक बड़े ही मधुर राग की रचना की थी। यह राग भैरवी ठाटसे उत्पन्न हुआ है ऐसा माना जाता है। इसके जैसेही और तीन राग है भैरवी, भूपाल तोड़ी और कोमल ऋषभ आसावरी। इन तिनों रागोंकी प्रकृती समान होने पर भी चलन, स्वर लगाव, वर्ज्य स्वरोंके कारण बिलकुल अलग अलग से हैं। 'बिलासखानी तोडी' का चलन तोडी जैसा होने के कारण इसका गांधार स्वर तोडी जैसा ही बहुत ही कोमल लगाना चाहिये। इसमें पंचम यह न्यारा स्वर है। लेकिन अवरोह में इसे नहीं लिया जाता। उसी तरह आरोह में वर्ज होनेवाला निषाद कभी कभी रंजकता बढ़ाने के लिए लिया जाता है। यह एक बड़ा ही मधुर राग है लेकिन गाने के लिए बहुत ही कठीन है। यह सिंह प्रधान राग है और इसकी प्रकृती शास्त्र के अनुसार शांत और गंभीर है। इस राग में हिंदी या मराठी के गाने न के बराबर है। 'लेकिन' इस फिल्म में गुलजारजी के शब्द और हृदयनाथ मंगेशकरजी के संगीत दिग्दर्शन में बने 'झूठे नैना बोले सांची बतिया' इस आशा भोसले और पंडित सत्यशील देशपांडे ने गाये हुए एक अप्रतिम गाने के लिए यह पुरा लेख लिखने का झंझट मैंने उठाया है। जिस रसिक ने यह गाना सुना नहीं है. उनसे बिनती है कि यह गाना जरूर सुने।

●यूट्यूब पर उपलब्ध गायक वादकों का बिलासखानी...

उस्ताद अमीर खान, सरस्वतीबाई राणे, पंडित जसराज, कुमार गंधर्व, जयतीर्थ मेवंडी, पं. अजय पोहनकर, पं. राजन, साजन मिश्र, पंडिता किशोरी आमोणकर, पं. प्रभाकर कारेकर, वीणा सहस्रबुद्धे, उस्ताद राशिद खान, उस्ताद शराफत हुसेन खान, पं. अजय चक्रवर्ती, आरती अंकलीकर, अश्विनी भिडे, पं. व्यंकटेश कुमार, कैवल्य कुमार गुरव, नागेश आडगावकर, यशस्वी सरपोतदार, संजीव चिमलगी, उस्ताद फतेह अली खान, मौमिता मित्रा, पिऊ मुखर्जी, वरदा गोडबोले, कौशिकी चक्रवर्ती, पं. संजीव अभ्यंकर, भाई कमलजीत सिंग, मिता पंडित, उस्ताद बिस्मिला खान-शहनाई, उस्ताद अली अकबर खान-सरोद, पं. रवी शंकर, सतार सारंगी उस्ताद विलायत खान आणि उस्ताद मुनीर खान. उस्ताद विलायत खान-सुरबहार, पं. शिवकुमार शर्मा- संतूर, पं. हरिप्रसाद चौरसिया-बासरी, पं. निखिल बॅनर्जी, पं. कुशल दास-सतार, कल रामनाथन व्हायोलिन, अभिषेक लाहिरी सरोद.

●मराठी

'रामा रघुनंदना', गायिका आशा भोसले, संगीत दत्ता डावजेकर

'जायचे इथून दूर काहूर मनी', गायिका-ज्योत्स्ना मोहिले, नाटक हे बंध रेशमाचे

●बिलासखानी रागपर आधारित एक मेरा ही गीत मैंने 2018 में स्वरबद्ध किया था। वह स्पोंटिफाय (spotify) युट्युब (youtube) के साथ बाकी सभी ऑडिओ प्लॅटफॉर्म पर यह गीत उपलब्ध है। अल्बम का शीर्षक है 'रे मना!

https://youtu.be/kCYnWcTeP50?si=Z O3dExdJGcQKDS9

रे मना, तुज काय झाले सांग ना। 

का असा छळतो जीवाला सांग ना।


हारण्याचीही मजा घे एकदा 

जिंकुनी तुज काय मिळते सांग ना।


हासुनी हसवायचा हा मंत्र घे

दुःख का कुरवळतो तू सांग ना। 


सूर लावून गुणगुणावे गीत है 

ते नि तू का वेगळा रे सांग ना।


गीत/संगीत सुधाकर कदम 

गायक- मयूर महाजन


(हिंदी अनुवादः डॉ. आरती मोने)

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अखिल भारतीय गांधर्व महाविद्यालय मंडल प्रकाशन

'संगीत कला विहार' फरवरी-मार्च २०२६


Tuesday, March 31, 2026

किती रुंजी तरी तिथल्या तिथे घालत रहावे

किती रुंजी तरी तिथल्या तिथे घालत रहावे
नवी क्षितीजे, नवे आकाश धुंडाळत रहावे

कधी हे मौन अपुले आपल्या पथ्थीच पडते
शहाण्याने मनाशी वाद हा घालत रहावे

तुझ्या गाण्यात विरघळती व्यथा अवघ्याच माझ्या
तुला ऐकत रहावे, बसऽऽ तुला ऐकत रहावे

तुझ्या डोळ्यातले गाणे,तुझ्या मौनातली धुन 
तुला पाहत रहावे की तुला ऐकत रहावे

गायक - सुरेश वाडकर
गझल - समीर चव्हाण
संगीत - सुधाकर कदम
तबला - पांडुरंग पवार
संगीत संयोजन - मिलिंद गुणे
ध्वनिमुद्रण - पंचम स्टुडिओ, पुणे,आजिवासन स्टुडिओ,मुंबई.
मिक्सिंग, मास्टरिंग - अजय अत्रे

#marathi​  #गझलगंधर्व#मराठीगझल#gazal​  #sudhakarkadamscomposition#music#composition​  #संगीतकार


Monday, March 30, 2026

Two Eminent Personalities Who Took The Supreme Poet Suresh Bhat to Every Home: Sudhakar Kadam & Bhimrao Panchale


Today's circumstances are different. Social media has become quite influential. Numerous periodicals are also being published, providing space to all forms of literature. But the era of Suresh Bhat was not like this. Social media certainly did not exist. Nor did ghazal programmes and conventions happen on the scale they do today. Suresh Bhat wrote and performed himself. But if anyone first took the responsibility of spreading his ghazals, poems, and songs across the entire Maharashtra, that person's name is **Sudhakar Kadam**. Hailing from Arni in Yavatmal district, this individual wholeheartedly sang Suresh Bhat's ghazals and organized various programmes, covering the length and breadth of Maharashtra. Inspired by his work, he was honoured with the '#Ghazalgandharv' title by renowned writer Dr. #Narendra_Jadhav and film director #Rajdatt. Today, **Bhimrao Panchale**, the '#Ghazal_Nawaz', continues this work after Suresh Bhat. Shri Bhimrao Panchale and Shri Sudhakar Kadam have truly carried forward Suresh Bhat's legacy. Not only that, just as Suresh Bhat nurtured a generation, these two have also worked to create generations.


Sudhakar Kadam's Arni is a small taluka town in Yavatmal district. But this man had an immense love for music and singing. Although this love began with an orchestra, he found his true calling when he was touched by the genius of poet Suresh Bhat, becoming a devoted follower of his ghazals, poems, and songs. Sudhakarrao and Bhat Saheb shared a close bond. They visited each other's homes. Hours were spent in conversations of joys and sorrows, but topics of music and singing would keep them awake all night. Consequently, the lines that Sudhakarrao Kadam presented before the public were embraced and held high by the people.


Sudhakar Kadam would call Suresh Bhat the #Mehdi_Hassan_of_Maharashtra. Such was the maturity in his words and melody. But this did not come easily to him. It required immense hard work and rigorous practice (*riyaz*). He infused that practice and effort into his voice and melody. Thus, Sudhakar Kadam truly did justice to Suresh Bhat's songs, ghazals, and poems. Moreover, Sudhakar Kadam was a music teacher in Arni, also engaged in journalism and acting. Playing instruments was his passion. In a sense, he was a multifaceted personality of that era. One could learn how to sing Marathi ghazals from Sudhakar Kadam. Suresh Bhat and #Yashwant_Dev would address him as their #first_ghazal_singer, and this was true. Because Suresh Bhat once wrote:

*"These simple, humble people / Are the true owners of my poetry."*


Sudhakar Kadam was a simple, straightforward personality living in a rural area. He genuinely loved Suresh Bhat's poetry and presented it to the public through his voice and melody. Naturally, people loved it. The reason for this was also similar. The commercial hue seen today had not seeped in during that era. There was an inseparable bond between the poet, the singer, and the connoisseur.


Today, Sudhakar Kadam has reached the age of 77. Yet, with the same vigour and sincerity, he continues to extol Suresh Bhat through his words and melody—this is his greatness. The Ghazal Convention has honoured him, and he truly deserves it.


**Bhimrao Panchale**


After Sudhakar Kadam, it was Bhimrao Panchale who came into contact with Suresh Bhat. To take Suresh Bhat far and wide, Bhimrao Panchale poured his soul into his words, voice, and melody. Hailing from the small rural village of Ashtgaon in Morshi taluka of Amaravati district, this personality has captivated the entire world with his ghazal singing. He has been honoured with the title 'Ghazalnawaz'. His style of presenting ghazals is unique. He delivers words with such beautiful phrasing that they settle deep in the hearts of connoisseurs. Among those who have carried forward the legacy of the ghazal through singing and presentation after Suresh Bhat, the name Bhimrao Panchale is well-known. By organizing ghazal conventions and workshops at various places, he has nourished Suresh Bhat's ghazal movement. Today, ghazal conventions and poet gatherings are happening everywhere, with new ghazal writers coming before the public. Some ghazal writers are so powerful that they enchant the audience. Providing a platform to such a generation and guiding them is a task Bhimrao has immersed himself in, and this is significant.


Just as Suresh Bhat did not limit himself but encouraged others, prepared primers on ghazals, sent them to many, corrected people's ghazals, and motivated them, the same work is being done today by Shri Bhimrao Panchale and Shri Sudhakar Kadam. While renowned singers from the Mangeshkar family—#Asha_Bhosle, #Lata_Mangeshkar, #Hridaynath_Mangeshkar—and famous singer Shri #Suresh_Wadkar have certainly endeavoured to bring Shri Suresh Bhat to every home, the efforts of Sudhakar Kadam and Bhimrao Panchale have literally taken Suresh Bhat directly into homes.


Now, many singers present programmes of the supreme poet Shri Suresh Bhat's ghazals. Among them are Shri #Suresh_Shukla from Kolhapur on the swing of *Shabd-Sur*; #Dattaprasad_Ranade; Ghazalratna Prof. #Rajesh_Umale; our own Amaravati's Shri #Suresh_Dande; Pune's Prof. Dr. ##Chandrakiran_Ghate; and many others are upholding Suresh Bhat's banner. This is a matter of pride for us from Amaravati. Because Suresh Bhat belonged to Amaravati, and this All India Elgar Ghazal Literature Convention on the 7th and 8th of February is also being held in Amaravati. On this occasion, these ghazal writers and lyricists from our Amaravati are, in their own ways, doing justice to Suresh Bhat across Maharashtra and beyond. This will undoubtedly be a milestone. My respectful salute to all of them on the occasion of the Ghazal Convention.


-Prof. Dr. Nareshchandra Kathole

Director

Mission IAS

Amaravati

9890967003

Sunday, March 29, 2026

गझलगंधर्व सुधाकर कदम - .डॉ.राम पंडित,मुंबई.'पद्मानंद'

#गझलनवाज सुधाकर कदम

#महाराष्ट्राचे_मेहदी_हसन सुधाकर कदम

अशा विविध संबोधनांनी मराठी गझल रसिकांना परिचित असलेले मराठीचे #आद्य_मराठी_गझलगायक,#संगीतकार,#कवी,#लेखक.


.          महाराष्ट्रातील गझलविधा खेडोपाडी रुजविण्याचे महत्कार्य स्व.सुरेश भटांसोबत फक्त गझलनवाज सुधाकर कदम यांनीच केले.वऱ्हाडातील आर्णी या छोट्या गावातून हा गझल फकीर गावोगावी भटांच्या गझला चालीसह पोहोचवीत होता तेव्हा आजचे नामवंत भावगीत गायक कोळी गीतांवर गुजराण करीत होते.जेव्हा सुधाकर कदम आर्थिक विवंचनेत होते तेव्हा सुरेश भटांनी  स्वखर्चाने आपल्यासोबत महाराष्ट्रभर गझल वाचन-गायनाचा कार्यक्रम करण्याची गळ घातली अन् कदमही आढेवेढे न घेता,कारणे न देता त्यांच्या सोबतीचे फकीर बनले.गाठीशी चांगली नोकरी असताना तिच्या बळावर अथवा अन्य निकषांवर गायन कार्यक्रम मिळविणे,त्यानंतर आर्थिक स्थैर्याची खात्री झाल्यावर व थोडे बहुत नाव झाल्यावर कलेला वाहून घेणे हे कलेच्या क्षेत्रात नेहमीच घडते.पण तदपूर्वीच नोकरी सोडून गायनासाठी आवकाची पर्वा न करता ,न कंटाळता,न वैतागता शेवटपर्यंत संघर्षरत राहणारे सुधाकर कदम हे एकमेव गायक होय.

           सुरेश भटांनी लेखी स्वरूपात ज्यांना गझलनवाज या उपाधीने गौरविले आहे ते एकमेव सुधाकर कदमच आहेत.शाहीर सुरेशकुमार वैराळकरांच्या आयोजनाखाली झालेल्या एका समारंभात त्यांना गझलगंधर्व ही पदवी बहाल करण्यात आली पण कदमांना त्या पदव्या मिरविण्याचा हव्यास नसावा.त्यांच्या अनेक हिंदी-उर्दू गझल,गीतांवरील स्वरलिपी काका हाथरसीच्या #संगीत  कार्यालयाच्या ग्रंथात अंतर्भूत आहेत.त्यावरून #पंडित  ही उपाधी ते सहजपणे लावू शकतात पण ही पदवी शासन दरबारातून किंवा विद्यापीठातून मिळत नाही हे सर्वश्रुत आहे.अशी पदवी स्वयंघोषितच लावतात.स्वतःला बिरुद चिटकवून घेण्याचा त्यांना तिटकारा आहे.

          सुधाकर कदमांचा आवाज,शास्त्रीय संगीताची जाण व गझल ही शब्दप्रधान गायकी आहे या गोष्टींचे भान व रागात गझल बांधण्याचे कसब हे गुण भटांना भावले व त्यामुळेच भटांनी त्यांना सोबत घेतले.

           सुधाकर कदमांच्या गझलगायनाने प्रेरित होऊन विदर्भातील अनेक गायक गझलगायनकडे वळले.त्यातील राजेश उमाळे,मदन काजळे, विजय गटलेवार, भीमराव गुलाबराव पांचाळे ही नावे नमूद करता येईल. कदमांच्या शैलीचा शिक्का आपणावर बसू नये म्हणून काही गायकांनी शब्दांपेक्षा सरगम व वाद्यवृंदाच्या पेशकशीचा आधार घेत आपल्या वेगळेपणाचा ठसा उमटविण्याचा प्रयत्न केला.कवीचे गझलेतील भाव तिच्यातील शब्दांद्वारे व आपल्या स्वर व सुरांच्या सहाय्याने रसिक श्रोत्यांच्या मनबुद्धीत संप्रेषित करणे हे गझलगायकाचे आद्य कर्तव्य आहे.(शब्दांना गौण मानून आलापांद्वारे आपले नैपुण्य प्रदर्शित करणे नव्हे.)याचा अनेक लब्धप्रतिष्ठित गवैयांना विसर पडतो 

           सुधाकर कदमांनी सरकार दरबारी पायऱ्या झिजवून अनुदान-याचक बनून जलसे केले नाहीत की आपले गायन क्षेत्र सोडून गझल लेखन क्षेत्रात लुडबुड केली नाही.खरे तर ते लेखक कवीही आहेत.तालवृत्तांएवढेच त्यांना छंदवृत्तांचेही ज्ञान आहे,पण त्यांनी शिष्यवर्ग घडवला तो आपल्या गायन क्षेत्रातच.

           सांदिपनी बनून आश्रमासाठी माधुकरी मागण्याचीही त्यांना आवश्यकता भासत नाही हे विशेष.

          वडील पांडुरंगपंत हे संगीत तज्ञ व संवादिनी वादक असल्याने सुधाकर कदमांना संगीताची गोडी लागणे स्वाभाविकच होते.त्यांनी सुधाकर कदमांना पुरुषोत्तम कासलीकर यांच्याकडे शिकण्यास पाठविले.अल्पावधीतच संगीत विशारद ही पदवी कदमांनी श्रेष्ठ श्रेणीत प्राप्त केली.'#अशी_गावी_मराठी_गझल' या कार्यक्रमाचे अनेक प्रयोग त्यांनी विविध ठिकाणी,विविध गावी केले.

           कदम म्हणतात,मराठी गझल जशी उर्दूकडून आली तशीच गझलगायकीही उर्दू गझल गायकांकडून उचलावी लागली.त्यांनी आपली गायन शैली मेहदी हसन,फरीदा खानम,गुलामअली,जगजितसिंह यांच्या गायकीवरून तयार झाली हे प्रामाणिकपणे मान्य केले आहे.वडिलांचे वारकरी भजन,गायन व शिवरंजनी ऑर्केस्ट्रामधील संयोजन व अकॉर्डियन,सोबत तबला,मेंडोलिन,सरोद,संतूर इत्यादी वाद्यांवर त्यांनी प्राविण्य मिळवले.एवढेच नव्हे तर मुलगा तबला वादक व दोन्ही मुलींना गायक म्हणून घडविले.

           सुधाकर कदमांना बंदिश तयार करणे ही संकल्पना,हा शब्दप्रयोग अयोग्य वाटतो.ते म्हणतात गझल वाचता वाचता आतल्या आत खळखळ सुरू होऊन एखादी सुरावट बाहेर येते,ती खरी बंदिश असते.ती आपली नसते...आपण फक्त माध्यम असतो.आलेल्या चाली (म्हणजे उर्दूतील आमद) आणि बांधलेल्या चाली यातील तफावत आत्मपरीक्षण केल्यास लक्षात येते.शब्द आणि स्वर दोन्हीही दमदार असतील तर दाद हमखास मिळते.

           वरील निष्कर्ष सुधाकर कदमांच्या प्रदीर्घ रियाज, अवलोकन,अध्ययन यातून उतरले आहेत हे सहज लक्षात येईल.गझलगायक संगीतकार असूनही त्यांनी आपल्या तालिमीत शिष्य गायक तयार करून त्यांना आपल्या गायनाच्या कार्यक्रमात संधी दिली हे मी फक्त कदमांच्या बाबतीत अनुभवले.एवढेच नव्हे तर गायनाची वर्कशॉप घेण्याची त्यांना गरजही भासली नाही.ते मूलतः कवी व लेखक असल्याने गझल सृजनाचे वर्कशॉप घेऊन मिळकत करणे त्यांना अशक्यही नव्हते.पण गझल गायनाला निष्ठा वाहिल्यामुळे गझलकरांच्या क्षेत्रात चमकोगिरी करून स्वतःचे स्तोम माजविणे व त्या बळावर शासनाकडे गझल भंडारा घालण्यासाठी हात पसरणे त्यांना उचित वाटले नाही.

           गझलच्या नावाखाली एखादी संस्था काढून दरवर्षी गझल उरूस भरवणे चोहीकडे चालले असताना अशा मोहाला कदम बळी पडले नाहीत ही स्पृहणीय बाब होय.त्यासाठी लागणारी लाचारी,संधिसाधुत्व,दूरदृष्टी ठेऊन मैत्री जोडण्याचे कसब (गरज संपतच तोडण्याची चलाखी) इ.चा अभाव असल्याने ते अर्थार्जनात मागे पडले असावेत,पण त्यांना या गोष्टीची खंत नाही.

           गझल लेखन ही आता विशिष्ठ वर्गाची मक्तेदारी राहिली नाही.या पूर्वार्ध वाक्याचा उत्तरार्ध असा की,गझल गायन ही आता विशिष्ट व्यक्तींचीही मक्तेदारी उरलेली नाही.डॉ.राजेश उमाळे,मदन काजळे,दत्तप्रसाद रानडे,विजय गटलेवार,दिनेश अर्जुना, आदित्य फडके,मयूर महाजन इ.कदमांचे प्रसंशक व शिष्य यांनी माझे हे म्हणणे सत्य ठरविले आहे.

           सुरेश भटांच्या 'ही कहाणी तुझ्याच न्हाण्याची' या गझलेसाठी भूपाळीचे स्वर कदमांना खुणावीत होते.पण अधीर या शब्दासाठी उचित सुरावट आढळेना अन् अवचित भूपाळीत अंतर्भूत नसलेला शुद्ध निषाद त्यांच्या मनात हजर झाला अन् तापलेल्या अधीर पाण्याची ही दुसरी ओळही स्वरबद्ध झाली.हा किस्सा इथे उद्धृत करण्यामागे हेतू एवढाच की कदमांपासून गझलगायनाची प्रेरणा घेणाऱ्या व अन्य गायकांनी हे जाणावे की, खरी चाल ,बंदिश ही आपण बांधली अशी गर्वोक्ती व्यर्थ आहे.

           इथे एक किस्सा नमूद करतो...

नबाब संत रहीम हे अत्यंत दानशूर होते तेवढेच विनम्रही होते.दोन हात उंचावून याचकांना दान देताना त्यांची दृष्टी जमातीकडे लावलेली असे.यावर गंग कवीने विचारले, 

          सीखे कहां नबाबजूं ऐसी देनी देन

          ज्यों ज्यों कर उंचा करा त्यों त्यों नीचे नैन

रहीम उतरले,

          देन हार कोई और है भेजत सो दिन रैन

          लोग भरम हम पै धरे यात नीचें नैन

नामवंतांनी 'देन हार कोई और है' याचं भान ठेवणं आवश्यक आहे अन् 'याते निचें नैन' ही वृत्ती बाणवणेही गरजेचे आहे.

           सुधाकर कदमांचा परिवार गायन क्षेत्रातच आहे.त्यांचा मुलगा व दोन्ही मुली शिष्य परिवारातच मोडतात.आपण गझलगायन इतरांना शिकवलं तर आपल्याला सरपास करून ते आपल्याहून अधिक विख्यात होतील अशा भयगंडाने शिकू इच्छिणाऱ्यांना त्यांनी कधी विन्मुख पाठविले नाही.गायकांना विद्यादानाची उदारवृत्ती कदमांनी आपल्यात रुजवली आहे.त्यामुळेच आपल्या नॅरेशन्स त्यांनी प्रकाशित करून नवोदित गझलकारांसाठी उपलब्ध करून दिल्या आहेत.

            ख्यालगायक एखादा राग पेश करताना जी शब्दरचना वापरतो त्या रचनेचा कवी बरेचदा त्यास ज्ञात नसतो. ती रचना त्याला परंपरेने प्राप्त झाली असते.इथे रागाची पेशकश प्रमुख असते.सहसा काव्य संप्रेषित होतेच असे नाही,पण गझलगायनात शब्द हे प्रधान असतात.गायक संगीतकार गझलेला स्वरसाज चढवीत असतो.(सुरावटीवरही गझल पाडून देणारे अनेक महाभाग असतीलही कदाचित अशांना गायनानुकूल न म्हणता गायनानुकूल गझलकार म्हणावे लागेल.) काही गझलगायक (गझलकारास त्याची गझल गायल्याचे मानधन तर देतच नाहीत.) गझल गाताना त्या गझलेच्या कवीचे नावदेखील मैफिलीत सांगण्याचे औदार्य दाखवीत नाहीत.एवढेच नव्हे तर त्याची गझल गाताना अन्य गझलकाराचे शेरही नाव न घेता घुसडतात.हे अनुचित व अनैतिक वर्तन म्हणावे लागेल.सुधाकर कदमांच्या मैफिलीत गझलकाराचा आवर्जून उल्लेख होतो.एवढेच नव्हे ते आपल्या साथीदारांचाही पूर्ण परिचय करून देतात.या गोष्टी गायकाबद्दल श्रोत्यांना अनुकूल मत नोंदविण्यास सहाय्यक ठरतात.गायकाच्या व्यक्तिमत्वाशी एक जमेची बाजू ठरते.विशेषतः कदमांसारखे आकर्षक व्यक्तिमत्व नसेल अशांनी ही बंधने अवश्य पाळावी. त्याने त्याचा दिलदारपणा श्रोत्यांना जाणवून अन्य न्यूनतेकडे दुर्लक्ष होईल.

           खरे तर सुधाकर कदम यांचा गौरव ग्रंथ त्यांची गझल गायनातील ज्येष्ठता व स्थान लक्षात घेता फार पूर्वीच यायला हवा होता,पण बाजारात ओरिजनल वस्तू महाग असते व चायनामेड स्वस्त व विपुल प्रमाणात उपलब्ध असते,त्यामुळे चायनाचे तकलादू प्रॉडक्ट् लवकर खपते हेच खरे.

           गझलगायक, गझलकार व गझल रसिकांनी हा ग्रंथ वाचणे अगत्याचे आहे.जेणेकरून या क्षेत्रात पारंगत म्हणून पाय रोवायचा असेल तर किती आर्थिक ,मानसिक व संघर्षाला सामोरा जाणे क्रमप्राप्त आहे हे समजेल.इथे शॉर्टकट नाही हे लक्षात येईल.खोट्या नाण्यांच्या या क्षेत्रात आपले खणखणीत नाणे जाणकारालाच ओळखता येते हेही ध्यानात येईल.


-डॉ.राम पंडित,मुंबई.'पद्मानंद'

४,एटलांता,सेक्टर ४०,सी वुडस-पश्चिम,

नवी मुंबई ४००७०६

मोबा.9819723756

Friday, March 27, 2026

तरुणा

 .                   तराणा

●नागपूरच्या दैनिक 'तरुणभारत  या वर्तमानपत्राच्या मुखपृष्ठावरील 'फेटे-फटकारे' शिर्षकांतर्गत आलेला खुसखुशीत लेख...दि.२६.४.१९९६.

                                     ■

     शास्त्रीय संगीतामधील विविध गायन शैलीपैकी एका शैलीला तराणा असे म्हणतात. या प्रकारात बंदिश अशी नसून, नुसतेच 'नोम्, तोम्, तदारे, तुंदिर, दानी' वगैरे निरर्थक शब्द असतात. हा प्रकार द्रुत लयीत गायिल्या जातो, द्रुत लयीच्या चमत्कृतीमुळे व त्यातील लयकारीमुळे रसिकांना हा प्रकार अतिशय आवडतो.

     शास्त्रीय संगीतातील विविध गायनशैलीप्रमाणे गायकांचीही विविध घराणी आहेत. त्या घराण्यांच्या नावेही आहेत. किराणा, आग्रा, पतियाळा, मेवाती, ग्वालियर वगैरे वगैरे. संगीतामधील घराणेशाही अजूनही सूरू असून, त्या त्या घराण्याच्या गायकांना व शिष्यवर्गाला त्या त्या घराण्याच्या नियमानुसार तालीम घेऊन त्याच पद्धतीने गावे लागते. (एवढ्या कडेकोट व्यवस्थेनंतरही काही गायक आपले वेगळे अस्तित्त्व निर्माण करतातच.) घराणेशाहीतील दुर्गुण इतर क्षेत्रांप्रमाणे संगीत क्षेत्रातही आहेत. एका घराण्याचा गायक दुसऱ्या घराण्याला नेहमीच कमी लेखून ते घराणे या घराण्यापेक्षा कसे कमकुवत आहे, या घराण्याची तान ते कसे घेऊ शकत नाही, त्यांचा स्वरलगाव कसा ठिसूळ आहे वगैरे आग्रही मतं सगळ्यांसमोर मांडत असतात.

     संगीतामधील ही घराणेशाही पाहिली की राजकारणातली घराणी आठवल्याशिवाय राहत नाही. कारण या घरण्यामध्येही संगीतातील घराण्यांप्रमाणे आपापले वेगळे नियम, वेगळे स्थान, हेवेदावे, शह-काटशह असतात. काँग्रेस, भाजपा, शिवसेना, भारिपा, खोरिपा, बसपा, कम्युनिस्ट ही या घराण्यांची नावे होय. प्रत्येक घराण्याची खासियत ठरलेली असते व त्यांचे महफिलीत गायचे रागही ठरले असतात. त्याचप्रमाणे राजकीय घराण्यातील घरंदाज सुद्धा गायनातील घरंदाजाप्रमाणे आपला एक एक राग रियाज करून तयार ठेवतात.

     संगीतामधील घराण्यांची ओळख त्यांच्या गायन पद्धतीवरून कळते, पण राजकीय घराण्यांची ओळख मात्र पंजा, कमळ, विळा-हातोडा, हत्ती, धुनष्यबाण, इ. चिन्हावरून कळते. चिन्हांप्रमाणेच यांचे रंगही ठरलेले असतात सेना, भाजपचा भगवा, मुस्लिम लीगचा हिरवा, रिपब्लिकनचा निळा, कम्युनिस्टांचा लाल वगैरे. (या रंगांमुळे त्यांनी कितीही रंग केले तरी चालतात.) 

     घरंदाज गायकांप्रमाणे राजकारणी सुद्धा आपल्या चेल्या-चपाट्यांना लहानपणापासूनच राजकारणाचे बाळकडू पाजून त्यांच्याकडून मोर्चे, बंद, नारेबाजी, जाळपोळ, मारामाऱ्या वगैरेंचा रियाज करून घेतात.हळू हळू ते छोट्या कार्यकर्त्यांपासून तो एकट्याने मैफिल जमवण्याइतपत तयारी करतात. लोक त्यांना ओळखायला लागतात. त्यांचे चाहते तयार होतात व निवडणुकीची तुतारी वाजली की या 'संगीत संमेलनात' गायलाच हवे, असा आग्रह धरून मंचावर 'उभे' होतात. या मंचावर प्रत्येक घराण्याचा एक एक उमेदवार उभा असतो व पुढील जुगलबंदीची तयारी म्हणून दंड थोपटून रियाजाला सुरवात करतो. एकदाचे या संमेलनात नाव नोंदविल्या गेले की, मग यांची जाहीर जुगलबंदी सुरू होते. वेगवेगळ्या घराण्याचे 'खट' कलावंत यात उतरल्यामुळे मतदारांचे भरपूर मनोरंजन होते. (जुगलबंदीकरिता तोडी, झिंझोटी व अडाणा रागांचा जास्तीत जास्त वापर केला जातो.)

     राजकारणातील घराणेदारांना 'दरबारी' राग फारच आवडतो. कारण हा राग (लाळ) घोटून घोटून आळवल्याशिवाय दरबारात प्रवेशच मिळत नाही व दरबारात शिरकाव झाल्याशिवाय अनेक वर्षांच्या रियाजलाही काही अर्थ राहात नाही. एकदा दरबारात शिरकाव झाला की मग मात्र त्यांना 'मधुवंती', 'रागेश्री', 'बागेश्री', 'दुर्गा', (पर)'देसी' ह्या रागिण्या आवडायला लागून सतत त्यांचे संपर्कात राहण्याचा ते प्रयत्न करतात. त्यातल्या त्यात 'धन'श्रीने आपल्या गळ्यात माळ घालावी म्हणून हे सर्वजण उत्तरा नक्षत्रातील दृष्याप्रमाणे तिच्या मागे मागे हिंडत राहतात.

     निवडणुकीच्या प्रचाराची सुरवात सर्वजण आपापल्या घराण्याच्या (पक्षाच्या) जाहिरनाम्यातील 'कल्याण' थाटातील रागाच्या विलंबित ख्यालाने करतात. शब्द असतात 'तूही एक अधार मेरो (मत)दाता'  व द्रुत ख्यालाचे बोल असतात 'जाऊँ तोरे चरण कमलपर वारी'. यानंतरचा तराणा प्रकार मात्र ते यावेळी न गाता निवडून आल्यावर सतत पाच वर्षे गात राहतात. कारण तराण्यातील निरर्थक बोल कोणालाच कळत नसतात. त्यामुळे मतदात्यांनाही 'तो' काहीतरी आपल्याच फायद्याचे बोलत असेल असे वाटून (बिचारे) सतत पाच वर्षे हा तराणा जिवाचे कान करून ऐकत राहतात. सर्व प्रकारच्या (गायन) शैलीमध्ये तरबेज असलेले हे घरंदाज, वरिष्ठांची जरी आरती गात असले तरी भक्तिगीते मात्र जनतेनेच म्हणावी ही त्यांची अपेक्षा असते व अशा प्रकारे मोठ्या 'मेहनतीने' जमवलेली महफिल पाच वर्षे टिकवून (भलेही मतदारांच्या घरात रोज 'दीप' राग आळवल्या जाऊन त्यांच्या घराची राखरांगोळी होवो.) आपल्या आयुष्यात 'बहार' आणून 'राजकल्याण' राग निश्चिंतपणे आळवीत बसतात.

-सुधाकर कदम

8888858850




Tuesday, March 24, 2026

ये कैसी शाम है...उर्दू ग़ज़ल

ये कैसी शाम है के दिल को कुछ क़रार नहीं

छलकता जाम नहीं, कोई ग़मगुसार नहीं


दिल के बहलाने को ये बात ठीक है लेकिन

किसी फरिश्ते पे अब मेरा ऐतबार नहीं


मुझे न शौक है हरदम इसे सुनाने का

ये शायरी है मेरी, कोई इश्तिहार नहीं


तेरी इक आह पे क़ुर्बान हुयी सल्तनते

वो कौन है जो इस अदा पे जाँनिसार नहीं


गुलुकारा - प्राजक्ता सावरकर शिंदे

शायर - डॉ.दिलीप पांढरपट्टे 'रिंद'

मोसिकार - 'शान-ए-ग़ज़ल' सुधाकर कदम

तबला - पांडुरंग पवार

हार्मोनियम - रामेश्वर ताकतोडे

गिटार - विशाल रामनगरीया

निज़ामत -शाहीर सुरेशकुमार वैरालकर


Live S.M.Joshi Sabhagruh, pune.

●headphone please

Sunday, March 22, 2026

मराठी गझल गायकीला पडलेलं _ स्वप्न...जैमिनी कडू

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     सन १९६५-६६! अकरावीपुढील शिक्षणासाठी माझ्या वडिलांनी मला अमरावतीच्या नमुना विभागातील श्री. गंगारामजी भगत (दादा) यांच्याकडे ठेवले होते. अमरावती शहरातील भगत परिवार म्हणजे चालते बोलते लॉजिंग-बोर्डिंग होते. तत्कालीन प्रख्यात बलवंत ट्रान्सपोर्ट सर्व्हिसचे ते एक भागीदार. त्या काळचे अमरावती शहर म्हणजे कापूस, ज्वारी व न्याचे प्रख्यात माहेरघर. त्यामुळे मध्यप्रदेशचा बहुतांश व्यापार अमरावतीमधून चालत असे. अमरावती ते बुऱ्हाणपूर, इटारसी, मुलताई, खंडवा, भोपाळ अशा बलवंत बसेस चालत. त्यामुळे भगत कुटुंबाचा सामाजिक परिवारही मोठाच होता. रोजच चार-पाच पाहुणे दादांकडे मुक्कामाला असत. स्वयंपाकघर सतत चालू असे. दादांचे धाकटे चिरंजीव नारायणराव, कमलाताई त्याच्या सुविद्य पत्नी दोघेही स्वभावाने अक्षरशः सज्जनपणाचा कळस. येणाऱ्या प्रत्येकाचे हसतमुखाने स्वागत होई अन् येणारा जेवूनच जायचा, अशा या भगत परिवारात मला शिक्षण घेण्याचे भाग्य लाभले.

     या भगत कुटुंबातील आमच्या कमलाकाकूंचा नातेवाईक असलेला सुधाकर कदम नावाचा समवयीन मुलगा अधूनमधून मुक्कामाला यायचा. अत्यंत रेखीव, सुहास्यवदनी, गव्हाळा रंग, मध्यम उंची, डौलदार कुरळे केस, उठावदार व्यक्तिमत्त्व. सुधाकरची पहिले भेट झाली ती याच वर्षी. आम्ही दोघेही कलाप्रेमी असल्याने बहुधा आमची भेट मैत्रीत बदलली. सुधाकरच्या रुबाबदार व्यक्तिमत्त्वाला सदाबहार गायकीची नैसर्गिक देणगी लाभलं होती तर माझ्या व्यक्तिमत्त्वाला प्रखर वक्तृत्वाची नैसर्गिक देणगी लाभली होती. यवतमाळातील शिवरंजन ऑर्केस्ट्राचा सर्वेसर्वा म्हणजे सुधाकर अन् अमरावतीमधील बोडे बंधूंच्या आराधना ऑर्केस्ट्रामध्ये मी मंचसंचालक. सुधाकरचे वडील पांडुरंगजी कदम हे कृषी (कुणबी) संस्कृती, सभ्यता व व्यवस्थेतील एक बऱ्यापैकी प्रस्थापित शेतकरी. वारकरी संप्रदायाचे नैसर्गिक लाभलेल्या सुरेल आवाजात भजन गाणारे. माझे वडील भाऊसाहेब कडू हेही याच संस्कृतीतील एक नामवंत शिक्षक. ही सारी पार्श्वभूमी कदाचित आमच्या गाढ मैत्रीचे सूत्र असावे. अजून एक म्हणजे चळवळ्या स्वभाव. यवतमाळच्या कलाक्षेत्रातला चळवळ्या सुधाकर तर अमरावतीच्या साहित्यनाट्य क्षेत्रातला चळवळ्या मी. मुंबईच्या चित्रपटसृष्टीत येऊन काही करण्याची दोघांचीही इच्छा. कधीच पूर्ण न झालेली. शिक्षणपूर्ती नंतर उदरनिर्वाहासाठी सुधाकर आर्णीला श्री. दत्तराम भारती विद्यालयात संगीत शिक्षक म्हणून कार्यरत झाला.मी ही पदवीनंतर नोकरीच्या शोधात नागपूरला आलो.त्यामुळे काही काळ भेटीगाठी थांबल्या.           

     याच काळात माझी सुरेश भटांची भेट झाली.अमरावतीपासून ओळख असल्यामुळे त्यांनी विचारपूस केली आणि मी बेरोजगार आहे हे कळल्याबरोबर त्यांनी त्यांच्या 'बहुमत' नामक साप्ताहिकात संपादकत्वाचे काम दिले.त्यावेळी ते खामल्यात राहत असत.

     सुधाकर आर्णीला श्री.महंत दत्तराम भारती विद्यालयात स्थिरावला.मी अमरावती सोडून नागपूरला आलो, रोजगाराच्या शोधार्थ अन् पत्रकार म्हणून स्थिरावलो. संगीत शिक्षक होऊन सुधाकर शिक्षक म्हणून मर्यादित राहिला नाही.आर्णीत गांधर्व संगीत विद्यालय स्थापन करून ग्रामीण भागातील विद्यार्थ्यांना संगीत शिक्षणाचे दालन खुले करून दिले.त्यासाठी अखिल भारतीय गांधर्व महाविद्यालय मंडळाचे परीक्षा केंद्रही मिळवले व आर्णी सोडेपर्यंत ३१ वर्षे ते चालविले.शिवजयंती उत्सव समिती स्थापन करून शिवसेना शाखेची मुहूर्तमेढही रोवली.त्याच्या प्रयत्नाने विदर्भातील पहिला-वहिला आमदार श्रीकांत मुनगिनवारच्या रूपाने त्याने शिवसेनेला दिला.पत्रकारीतही केली.अभिनय कला मंडळाची स्थापना करून एकांकिका स्पर्धांचे आयोजन केले.कलावंत मेळावे,मराठी गझल गायन स्पर्धा,संगीत विद्यालयाचा वार्षिकोत्सव असे विविध उपक्रम राबवून युवा विश्वाच्या व्यक्तिमत्व विकासाची चळवळ राबवित राहिला.पण गझलगायकी मात्र सोडली नाही. सुधाकरने शिवसेनेचा आमदार व्हायचे ठरविले असते तर दिग्रस विधानसभा मतदार संघातून (विदर्भातून पहिलाच) शिवसेनेचा आमदार म्हणून हमखास विजयी झाला असता.पण राजकारणापेक्षा नैसर्गिक लाभलेले  अन् चिरस्थायी असलेले गीत-संगीताचे क्षेत्र त्याने सोडले नाही.राजकारण कायमचे मागे पडले.इकडे मी दक्षिण नागपूर विधानसभा मतदारसंघातून आमदार व्हायचे ठरवले असते तर एका वजनदार काँग्रेसी नेत्याच्या शब्दावर इंदिरा काँग्रेसचा आमदार झालो असतो.परंतु भांडवलदाराच्या पैशावर त्याचा चमचा होण्याचे नाकारले.पत्रकार व पुढे शिक्षक म्हणूनच कार्यरत राहिलो.सुधाकर व माझ्या व्यक्तिमत्वातली ही साम्यस्थळे आजवरच्या मैत्रीतील अतूट धागे आहेत.फरक इतकाच की, सुधाकर पुण्यात जाऊन संगीत क्षेत्रातील त्याची स्वप्ने पूर्ण करण्याचा प्रयत्न करत राहिला व मी नागपुरात राहिलो.

       सुधाकरला मी 'मराठी गझल गायकीला पडलेले स्वप्न' म्हणतो. सुधाकर अव्वल दर्जाचा संगीतप्रेमी. संगीतातील वादन कलेपासून अन्य सर्व घटकांचे त्याचे ज्ञान विलक्षण असेच होते. वयाच्या १० व्या वर्षापासून तबला वादनाचे धडे घेत, वडिलांकडून हार्मोनियम धडे घेतल्यामुळे १६ व्या वर्षी यवतमाळच्या शिवरंजन या ऑर्केस्ट्रामध्ये अकॉर्डिअन वाजवायला लागला. तसेच तो नागपूर आकाशवाणीचा मान्यताप्राप्त गायक व मेंडोलिन वादक झाला, सरोद-संतूरसारखी वाद्ये सुध्दा तो लिलया हाताळत असे. अशातच विदर्भ साहित्य संघाने नव्यानेच संगीत विभाग सुरू करायचे ठरवले. उद्घाटनानिमित्त गडकरी सभागृहात सुधाकरचा कार्यक्रम ठरविण्यात आला.यावेळी सुधाकरने एक तास सरोद वादन व एक तास गायन असा कार्यक्रम केला.या कार्यक्रमाचे अध्यक्ष दादा म्हणजे सुरेश भट होते.(अमरावतीत असताना सुरेश भटांच्या हाताखाली वार्ताहर म्हणून काम करण्याची संधी मला दीर्घ काळ मिळाली. तसेच त्यांच्या नागपूरहून प्रकाशित होणाऱ्या साप्ताहिकाचा संपादक होतो.) सुधाकरने गायिलेली शंकर बडे यांची गझल व बंदिश त्यांना खूप आवडली. माझ्या माहितीप्रमाणे तो मराठी गझल गायनाचा महाराष्ट्रातील पहिलाच प्रयोग होता. या प्रयोगला दादांनी मनापासून दाद दिली.

      त्याच्या गायकीला अनुवांशिकतेची साथ असली तरी आजच्या त्याच्या गायकीला त्याच्या परिश्रमाची,प्रयोगाची पार्शवभूमी आहे. मराठी शिक्षण क्षेत्रातील पहिला असा संगीत शिक्षक की, ज्याने पाठ्यक्रमातील कवितांना चाली लावून विदयार्थ्यांना शिकविले. मराठी गझल कशी गावी, हे त्याने प्रभावीरीत्या सिद्ध केले.गीत-संगीतातील सर्व बारकावे हेरून,गझलमधील भावार्थाला प्राशन करून शब्दरूप द्यायचे अन् शब्दशक्तीला बाधा पोहचू न देता आपल्या गायकीतून सादर करायचे तेव्हा रसिक श्रोत्यांच्या मुखातून उत्स्फूर्तपणे उद्गार बाहेर यायचा, वाहव्वा! मी गझलश्रवणप्रेमी आहे.परंतू गझलेतील काव्य-शास्त्रीय संगीत-शास्त्रीय ज्ञानाचा यत्किंचितही गंध नसलेला गझलश्रवणप्रेमी आहे.गझल ऐकताना कर्णमाध्यमातून मेंदू व हृदय यांना भावणाऱ्या अलौकिक अशा भावना शब्दशक्तिमधील उच्चार अभिव्यक्तीत उणीव असेल तर बाधित होतात, याचा अनुभव घेतलेला. सुधाकर हा कौटुंबिक सदस्य असल्याने कौटुंबिक गझल मैफली झडत असत. त्यावेळी अलौकिक प्रत्यय अनुभवता येत असे. अशा अलौकिक गायकीच्या सुधाकरला मराठी गझलसाम्राट सुरेश भटांनी दिलेल्या पावतीचा मी जिवंत साक्षीदार आहे. 

     सुधाकरच्या आवाजातून त्यानेच स्वरबध्द केलेली भटांची 'कुठलेच फूल आता मजला पसंत नाही, ही गझल जेव्हा घनदाट रानातील झुळझुळणाऱ्या झऱ्यासारखी बाहेर पडली तेव्हा भटांनी त्याला '#महाराष्ट्राचे_मेहदी_हसन' म्हटल्याचे याची देही याची डोळा मी पाहिले आहे. 

     त्यानंतर 'सुरेश भटांची गझल व सुधाकरची गायकी' एक समीकरणच झालेले अख्ख्या महाराष्ट्राने अनुभवले. सुरेश भटांची गझल अन् सुधाकरची अनुरूप स्वररचना,संगीतसाथ म्हणजे अलौकिक सांगीतिक अनुभव.

'सूर्य केव्हाच अंधाराला यार हो

या नवा सूर्य आणू चला यार हो'

 हा सुरेश भटांचा प्रत्ययकारी विद्रोह तेवढ्याच प्रत्ययकारी अदाकारीने सुधाकरच्या गझलगायकीतून कानावर यायचा. तेव्हा रसिक भावविभोर न झाला तरच नवल. विद्रोह हा पोवाड्यातून अधिक परिणामकारकरीत्या अभिव्यक्त होतो.तो विद्रोह सुधाकर आपल्या गझल गायकीतून उत्कटपणे सादर करू शकत होता,अशा गझल गायकीतून शृंगार अन् करूण रसातली गझल रसिक श्रोत्यांच्या पसंतीला न उतरली तरच.

            सुधाकरमध्ये एक कवी पण दडलेला आहे.

'सरगम तुझ्याचसाठी,गीते तुझ्याचसाठी

गातो गझल मराठी प्रिये तुझ्याचसाठी'

ही त्याची रचना '#सरगम_तुझ्याचसाठी' या त्याच्या बंदिशींवर आधारित कार्यक्रमामधून त्याच्या मुली भैरवी,रेणू सादर करायच्या.सुधाकर हा शास्त्रीय संगीतातील योगी.त्यामुळे त्याच्यातील कवी संगीतमय कविता प्रसवणारा. नैसर्गिक सौंदर्यभावाची देणगी लाभलेल्या मायेने आपल्या गोंडस मुलाला साजशृंगाराने सजवून त्याचे सौंदर्य अधिक खुलवावे,तसे सुधाकरचे त्याच्याच काव्याबाबत .हा रसाविष्कार त्याच्या गझलगायकीतही रसरसून भरलेला आहे.कवी,कुशल संघटक, संगीतकार,गायक,संगीतकार,शिक्षक आणि पत्रकार असे बहुआयामी व्यक्तिमत्व लाभलेल्या सुधाकरलाही अखेर सांस्कृतिक विषमतेचा बळी व्हावे लागलेच.अक्षरशः पुण्यात राहूनसुद्धा कृषी संस्कृती,सभ्यता व व्यवस्थेतही कोहिनूर पैदा होतात,आहेत,झालेत.परंतू कोळसा खाणीतील कोळशाला जशी रत्नाची पारख नसते,तसेच या व्यवस्थेतील प्रज्ञावंतांचे होते.कृषी व्यवस्थेला नैसर्गिक उत्पादन करण्याची कला ठाऊक असते,मात्र त्या नैसर्गिक उत्पादनाचे कृत्रिम मार्केटिंग करण्याची कला अवगत नसते.परिणामी कृषकाचा गहू खाणाऱ्याला जितका माहीत होतं नाही,तितका 'टाटाचा बाटा' माहीत होतो.दूध उत्पादक कृषकाचे दूध त्याच्या व त्याच्या गायी-म्हशीच्या नावे ओळखल्या जात नाही.ते 'हल्दिराम' वा 'दिनशॉ' च्या नावाने ओळखले जाते.तसे काही सुधाकरचे झाले आहे.

      सुधाकर आणि माझ्यातील आणखी एक साम्यस्थळ म्हणजे आम्ही दोघांनीही आंतरजातीय विवाह केला आहे.माझी बायको कलार समूहातील,सुधाकरची बायको आमच्या प्रिय सुलभा वहिनी या ब्राह्मण समूहातील.माझी बायको 'कुणबी' होऊ शकली नाही,पण मूळच्या ब्राह्मण असलेल्या सुलभा वहिनी अगदी सुलभ रित्या 'कुणबी' झाल्या.जातीने नव्हे प्रवृत्तीने.ब्राह्मण तरुणीशी आंतरजातीय विवाह करणाऱ्या बहुजन तरुणांची अवस्था कशी होते,हे मी अनुभवून आहे. म्हणूनच मला सुलभा वहिनींचा खूप खूप अभिमान आहे की, त्यांनी सुधाकरचे जीवनसाथी होण्याचे ज्या दिवशी निश्चित केले त्याच दिवशी आपले ब्राह्मण्य सुलभरीत्या त्यागले अन्  कुणबित्व स्वीकारले. सुधाकर आज जे काही मिळवू शकला त्यात सुलभा वहिनींचा वाटा तितकाच आहे, जितका गझलगायकीत संगीताचा.सुधा-सुलभा या अलौकिक व्यक्तिमत्वाच्या जीवनात ज्या दोन गझलांनी आणि एका अभंगाने जन्म घेतला, त्या भैरवी अन्  रेणू या पोरी व निषाद हा पोरगा.तिघेही स्वरसंगीत घेऊनच जन्मले अन् आपल्या पित्याच्या स्वरसंगीतमय जीवनातील अविभाज्य असे घटक होऊन राहिलेत.मराठी गझलगायकीला पडलेले 'सुधाकर कदम' नावाचे स्वप्न आज अत्यंत कृतकृत्य जीवन जगत आहे.मणक्यांच्या दुखण्यामुळे थोडा वेग कमी झाला असला तरी आवेग कमी झालेला दिसत नाही. हे त्याच्या एकामागून एक रसिकांच्या सेवेत येत असलेल्या अल्बम्सवरून दिसते आहे. अशीच दीर्घतम संगीतसेवा त्याच्याकडून घडण्यासाठी दीर्घायुरारोग्यासाठी निसर्गाजवळ प्रार्थना करतो.


(पत्रकार,लेखक,समाजसुधारक)

५,आर.एम.एस.कॉलनी,

मानेवाडा रोड

नागपूर.


(प्रा.श्रीकृष्ण राऊत संपादित,#अक्षरमानव प्रकाशित सन्मानग्रंथ #चकव्यातून_फिरतो_मौनी २०१८ मधून...)

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ज्या गझलवरून '#महाराष्ट्राचे_मराठी_मेहदी_हसन ही उपाधी दिली.त्या गझलची लिंक....

https://youtu.be/fnibDhN5x7o





 





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