सुरेशजीने अपने खास अंदाज़ में गायी हुई समीर की यह उर्दू ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद है।क्यों की ग़ज़ल, गायन और बंदिश सभी दिल लुभानेवले है।यह ग़ज़ल जनसंमोहिनी राग पर आधारित है।लेकिन इसके शेरों में आनेवाला तीव्र मध्यम मन को मोह लेता है। इसे एकदम गले से उतारना मुश्किल था।लेकिन सुरेशजीने इसे बखुबी उतारकर चार चांद लगा दिए है।
आप भी सूनकर लुत्फ़ उठाईएगा...पसंद आए तो डॉ शब्द लिखीएगा।

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