गझल

माझी मराठी गझल गायकी

मराठी गझल गायकीला तशी कोणतीही परंपरा नाही.माझ्या अगोदर मराठी गझल,गझलसारखी गाण्याचा फ़ारसा प्रयत्न कोणीच केला नसल्यामुळे मराठी गझल गाणे हे माझ्यासाठी आव्हान होते.मराठीमध्ये गझल जशी उर्दूकडून आली तशीच मराठी गझल गायकीही उर्दू गझल गायकांकडून उचलावी लागली.माझी गायकी किंवा ढंग हा पाकिस्तानचे मेहदी हसन,फ़रिदा खानम,गुलाम अली व आपले जगजीत सिंग ह्यांच्या गायकीवरुन तयार झाला आहे.त्या काळात विदर्भातील यवतमाळ जिल्ह्यातील आर्णी सारख्या आडवळणी गावात वरील गायकांच्या ध्वनिमुद्रिका सुध्दा मिळत नव्हत्या.पाकिस्तान रेडिओवरुन जे काही ऐकायला मिळायचे त्यावरुन मला जेवढे शिकता येईल तेवढे शिकत गेलो.पुढे स्व.सुरेश भटांनी मला मेहदी हसन,फ़रीदा खानम, यांच्या ध्वनिफ़िती दिल्या.हळूहळू गुलाम अली,जगजीत सिंग,बेगम अख्तर यांच्याही गायकीचा अभ्यास करुन मी माझा वेगळा असा बाज निर्माण केला. (पृष्ठ क्रमांक क्लिक केल्यास एक- एक पृष्ठ आपल्याला वाचता येईल)

पृष्ठ क्र.



Wednesday, July 29, 2026

इतना मुझे चाहा करो ना...उर्दू ग़ज़ल

जनसंमोहिनी  राग पर आधारित यह उर्दू ग़ज़ल आपको ज़रूर पसंद आएगी। इस बंदिशी की विशेषता है छंदों में उच्च स्वरों का प्रयोग। इसे सुनिए...


इतना मुझे चाहा करो ना, इस के मैं क़ाबिल नही

मुझ सा कोई संगदिल न हो, तुम सा कोई बिसमिल नही


अपनी जगह तुम हो सही, अपनी जगह मैं ठीक हूँ

शिकावे-गिले जायज़ मगर,शिकवो से कुछ हासिल नही


चलना ही है ज़िंदादिली चलते रहो चलते रहो

मंज़िल सबब रुकने का ले,बेशक वो ज़िंदादिल नही


मौजे तमन्ना थाम ले कब तक कहाँ तक ऐ 'समीर'

दिल का समंदर है अजीब,इस का कोई साहिल नही

                              ●●●

कलावती और जनसंमोहिनी रागों के बारे में संक्षिप्त जानकारी।

कलावती और जनसंमोहिनी राग इतने मिलते-जुलते हैं कि आम आदमी के लिए इनमें अंतर करना मुश्किल है! दोनों राग बहुत मधुर हैं। ये दोनों राग दक्षिण भारतीय संगीत प्रणाली (कर्नाटक संगीत) से हैं। अपनी मधुरता के कारण ही ये उत्तर भारतीय संगीत प्रणाली में भी लोकप्रिय हुए। इनका थाट खमाज है और निषाद को छोड़कर बाकी सभी स्वर शुद्ध हैं। कलावती राग में ऋषभ नहीं होता। कलावती राग में ऋषभ का प्रयोग करने पर जनसंमोहिनी राग बनता है। इसमें ऋषभ का प्रयोग कल्याण अंग के साथ किया जाता है। जनसंमोहिनी राग का मूल नाम 'शिव कल्याण' भी कहा जाता है।

'कोई सागर दिल को बहलाता नहीं' - यह गाना फिल्म 'दिल दिया दर्द लिया' से है, जिसने मेरे ऑर्केस्ट्रा में रहने के दौरान अपार लोकप्रियता हासिल की। ​​मैं इसे अपने घर के संगीत कार्यक्रमों में गाया करता था। अगर मेरे सामने युवा लड़कियां होतीं, तो मैं इसे बड़े जोश से गाता था। तभी मुझे बुनियादी जानकारी मिली कि यह गाना कलावती राग में है। मुझे बहुत बाद में पता चला कि इस में जनसंमोहिनी राग भी है। इसके बाद, फिल्म 'मुंबईचा जवाई' से रामदास कामत द्वारा गाया गया गाना 'प्रथम तुज पाहता, जीव वेडावला' हम (उस समय के) युवाओं को दीवाना बना दिया था। कई वर्षों तक, मैं इन दोनों गानों को  घर के संगीत कार्यक्रमों में गाता रहा। लेकिन कलावती का असली अर्थ प्रभा अत्रे की 'तन मन धन तो पे वारू' इस बंदिश से। एकताल राग की यह रचना बारहवें छंद से शुरू होती है। सम के ऊपर का 'न' श्रोता को मंत्रमुग्ध कर देता है।उपरोक्त रचना श्रोता को मंत्रमुग्ध कर देती है। उनकी गायन शैली और गीतों से निकलने वाली मधुरता बेहद आकर्षक है। आज भी यह गीत युवा लगता है। इसके अलावा, डॉ. वसंतराव देशपांडे द्वारा गायी गई झपतालकी बंदिश 'ये हो कहे' भी मेरी पसंदीदा थी, क्योंकि यह बहुत ही सुरीली थी।

No comments:





संगीत आणि साहित्य :