गझल

माझी मराठी गझल गायकी

मराठी गझल गायकीला तशी कोणतीही परंपरा नाही.माझ्या अगोदर मराठी गझल,गझलसारखी गाण्याचा फ़ारसा प्रयत्न कोणीच केला नसल्यामुळे मराठी गझल गाणे हे माझ्यासाठी आव्हान होते.मराठीमध्ये गझल जशी उर्दूकडून आली तशीच मराठी गझल गायकीही उर्दू गझल गायकांकडून उचलावी लागली.माझी गायकी किंवा ढंग हा पाकिस्तानचे मेहदी हसन,फ़रिदा खानम,गुलाम अली व आपले जगजीत सिंग ह्यांच्या गायकीवरुन तयार झाला आहे.त्या काळात विदर्भातील यवतमाळ जिल्ह्यातील आर्णी सारख्या आडवळणी गावात वरील गायकांच्या ध्वनिमुद्रिका सुध्दा मिळत नव्हत्या.पाकिस्तान रेडिओवरुन जे काही ऐकायला मिळायचे त्यावरुन मला जेवढे शिकता येईल तेवढे शिकत गेलो.पुढे स्व.सुरेश भटांनी मला मेहदी हसन,फ़रीदा खानम, यांच्या ध्वनिफ़िती दिल्या.हळूहळू गुलाम अली,जगजीत सिंग,बेगम अख्तर यांच्याही गायकीचा अभ्यास करुन मी माझा वेगळा असा बाज निर्माण केला. (पृष्ठ क्रमांक क्लिक केल्यास एक- एक पृष्ठ आपल्याला वाचता येईल)

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Wednesday, April 1, 2026

राग-रंग - बिलासखानी तोडी

 

                           (लेखांक १३)

                  #राग #बिलासखानी_तोडी 

     दक्षिण भारत के संगीत तज्ञ कहते हैं कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को कुछ मुस्लिम संगीतकारोंने बिगाड़ दिया है, तो कुछ मुस्लिम संगीतकारोंका कहना यह है कि मुस्लिम संगीत तज्ञों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को सजाया और उसे और ज्यादा खूबसूरत बनाया।

     अगर इतिहास देखा जाये तो भारतीय बेपारियों के अरबी बेपारीयोंसे सैंकडों सालोंसे बेपार से संबंधित रिश्ते जुड़े हुए हैं। हजरत मोहम्मद के जनम से भी पहले कुछ अरबी ग्रंथ रामपूर के 'रजा पुस्तकालय' में सुरक्षित हैं, उन में कुछ विशिष्ट गीतों की स्वरलिपी भी है, जो साम गायन करनेवाले 'गात्रबिना' विधी से प्रभावित है। इससे यह समझ में आता है कि अरब लोग इस्लाम का उदय होने से पहले भारतीय स्वरविधीसे परिचित थे। दक्षिण भारत से तो अरबी बेपारियों का संबंध बहुत पुराना है। इसवी सन 868 में जाहज नामक एक अरबी लेखक ने भारतीय संगीत की भरपूर तारीफ की है। इसमें खास करके 'एक तारा' याने 'एक तंत्री बिना' से संबंधित चर्चा बहुत महत्वपूर्ण समझी जाती है। स्पेन के इतिहासकार काझी साहूद उदलूसमी ने, जिसमें रागों के स्वरों का वर्णन है, ऐसे भारतीय ग्रंथ हम तक पहुंचावे, ऐसा जिक्र इसवी सन 1017 में किया है। (संदर्भ: अरब और हिंद के तालुकात, लेखकः सय्यद सुलेमान नदवी, हिंदुस्तानी अकॅडमी, पृष्ठ 157) अमीर खुसरो ने भारतीय संगीत पुरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है ऐसा कहा है। (संदर्भ: अरब और हिंद के तालुकात, लेखकः सय्यद सुलेमान नदवी, हिंदुस्तानी अकॅडमी, पृष्ठ 158) भारतीय संगीत सीखने के लिए विदेशसे कई विद्यार्थी भारत जाते रहते थे, ऐसा जिक्र 'खिलजीकालीन भारत' इस संथ के पृष्ठ क्रमांक 180 पर है। इसवी सन 753 से लेकर 774 के बौचवाले समय में कई भारतीय ग्रंथ जरबस्थान ले जाकर उनका अरबी भाषा में अनुवाद किया गया। उस समय बगदाद में खलिफा मन्सूर का शासन था। खलिफा हारून के (786 से लेकर 808) इस समय में कई अरब विद्यार्थीयोंको विभिन्न विद्याओंके अध्ययन के लिए भारत भेजा गया और भारत के विद्वानों को बगदाद बुलाया गया। प्रसिद्ध संगीत तज्ञ शेख बहाउद्दिन झकेरिया का संगीत संप्रदाय अरबी संगीत के प्रभाव में था। झकेरिया सुफी के सुहरवर्दी परंपरा के महापुरुष थे। उनका कार्यक्षेत्र सिंध प्रांत होने के कारण पंजाब और सिंध के लोकगीतों का इस संप्रदाय पर पूरी तरह से प्रभाव था। खैबर घाटी से आये हुए मुसलमान और अरबस्तान से आये हुए मुसलमान इन दोनों के स्वभाव, चरित्र और संगीत में बहुत बड़ा फर्क था। चाहे दोनों के धार्मिक संबंध थे, लेकिन सांस्कृतिक संबंध बिलकुल भी नहीं थे। अरबी संगीत और इरानी संगीत पूरी तरह अलग अलग है। अमीर खुसरो को इसका ग्यान था। इरानी संगीत के चार 'उसूल' और 'बारा परदों का' अभ्यास करने के बाद भी उसने भारतीय संगीत को ही सर्वश्रेष्ठ माना है। चिस्ती परंपरा के प्रसिद्ध पुरुष शेख निजामुद्दीन विस्ती के दर्गा पर खुसरो की जो रचनायें गाई जाती हैं, वे सब भारतीय लोकधून पर आधारित शुद्ध भारतीय है। (संदर्भ: संगीत चिंतामणी)

     अकबर के दरबार में ग्वालियर परंपरा के मर्मज्ञ और साथ ही फारसी परंपरा के विदेशी कलाकार भी थे। उस समय की परिस्थिती संगीत में नये नये प्रयोग करने के लिए बहुत ही अनुकूल थी। ऐसा अबुल फजल के 'आईने अकबरी' के लिखापढी से समझ आता है।उस समय संगीत में कई प्रयोग हुए और इन्ही प्रयोगों से ही तानसेन का मिया मल्हार, दरबारी कानडा इन रागोंका उदय हुवा। कई प्रयोग हुए और इन्ही प्रयोगों से ही तानसेन का हुवा। (कानडा यह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के रागों  का समूह है,जिसे कान्हडा इस नाम से भी पहचाना जाता है। कानडा यह नाम कर्नाटक रागों का समूह है, जिसे कान्हडा इस नाम से संगीत परंपरा और कन्नड देश से आया होगा ऐसा लगता है। इस समूह के राग अलग अलग ठाटोंके हैं लेकिन विशेष करके आसावरी या काफी ठाटके है।। कानडा के कुल मिलाकर 18 प्रकार माने जाते है। उसमें शाम कानडा, मंगल कानडा, कोलाहल कानडा, मुद्रिक कानडा, नागध्वनी कानडा, टंकी कानडा, जैजवंती कानडा, गारा कानडा, काफी कानडा, बागेश्री कानडा, सुधराई कानडा, सुहा कानडा, शहाणा कानडा, अडाणा कानडा, हुसैनी कानडा, अभोगी कानडा, कौशी कानडा, नायकी कानडा ये प्रकार है। इसमें से कई प्रकार आज नामशेष हो चुके हैं।)

     'मियां की तोडी' (गुजरी या गुर्जरी तोडी, देसी तोडी, हुसैनी तोडी, आसावरी याने कोमल ऋषम आसावरी ऐसे तोडी के कई प्रकार प्रसिद्ध हैं।)

     धोंधू का 'धोंधू की मल्हार', चरजुका 'चराजू की मल्हार', (मेघ मल्हार, रामदासी मल्हार, गौड मल्हार, सुर मल्हार, देस मल्हार, नट मल्हार, धुलिया मल्हार, मीरा की मल्हार ऐसे मल्हार के भी कई प्रकार है।) इस प्रकार से नये नये राग संगीत जगत को मिलते गये और यह परंपचा आगे भी कायम रही।

    (मैंने भी भारतीय शास्त्रीय संगीत में न होनेवाली एक नयी सुरावट में मराठी गझल स्वरबद्ध की है। इस राग को 'सुधाकरी तोडी' ऐसा नाम दिया है।

ठाट - भैरवी

वादी स्वर - रिषभ

संवादी स्वर - पंचम

गान समय - दिन का पहला प्रहर

आरोह सा कोमल, रे कोमल, ग प कोमल,निसां

अवरोह- सां कोमल, नि प कोमल, ग कोमल,रेसा

आरोह और अवरोह में पांच स्वर होने के कारण शास्त्र के अनुसार इसकी जाती औडव औडव हो जाती है।


(इसे मान्यता मिलेगी या नहीं, मुझे पता नहीं क्यूंकि मैं शास्त्रीय संगीत का पंडित, डॉक्टर, प्राध्यापक या किसी महाविद्यालय का संगीत विभाग प्रमुख नहीं हूं।)

शब्द है...

'माझी गझल गुलाबो भरते हसून प्याला, 

माझ्या नशेत अवघा जातो बुडून प्याला'

रसिकोंको सुनने के लिए यूट्यूब लिंक

https://youtu.be/hRVkLxUFU ng?si=Vk 6p5c2ZdwSPYPT

     जहांगीर के समय में तानसेन का बेटा बिलासखान ने 'बिलासखानी तोडी' नाम के एक बड़े ही मधुर राग की रचना की थी। यह राग भैरवी ठाटसे उत्पन्न हुआ है ऐसा माना जाता है। इसके जैसेही और तीन राग है भैरवी, भूपाल तोड़ी और कोमल ऋषभ आसावरी। इन तिनों रागोंकी प्रकृती समान होने पर भी चलन, स्वर लगाव, वर्ज्य स्वरोंके कारण बिलकुल अलग अलग से हैं। 'बिलासखानी तोडी' का चलन तोडी जैसा होने के कारण इसका गांधार स्वर तोडी जैसा ही बहुत ही कोमल लगाना चाहिये। इसमें पंचम यह न्यारा स्वर है। लेकिन अवरोह में इसे नहीं लिया जाता। उसी तरह आरोह में वर्ज होनेवाला निषाद कभी कभी रंजकता बढ़ाने के लिए लिया जाता है। यह एक बड़ा ही मधुर राग है लेकिन गाने के लिए बहुत ही कठीन है। यह सिंह प्रधान राग है और इसकी प्रकृती शास्त्र के अनुसार शांत और गंभीर है। इस राग में हिंदी या मराठी के गाने न के बराबर है। 'लेकिन' इस फिल्म में गुलजारजी के शब्द और हृदयनाथ मंगेशकरजी के संगीत दिग्दर्शन में बने 'झूठे नैना बोले सांची बतिया' इस आशा भोसले और पंडित सत्यशील देशपांडे ने गाये हुए एक अप्रतिम गाने के लिए यह पुरा लेख लिखने का झंझट मैंने उठाया है। जिस रसिक ने यह गाना सुना नहीं है. उनसे बिनती है कि यह गाना जरूर सुने।

●यूट्यूब पर उपलब्ध गायक वादकों का बिलासखानी...

उस्ताद अमीर खान, सरस्वतीबाई राणे, पंडित जसराज, कुमार गंधर्व, जयतीर्थ मेवंडी, पं. अजय पोहनकर, पं. राजन, साजन मिश्र, पंडिता किशोरी आमोणकर, पं. प्रभाकर कारेकर, वीणा सहस्रबुद्धे, उस्ताद राशिद खान, उस्ताद शराफत हुसेन खान, पं. अजय चक्रवर्ती, आरती अंकलीकर, अश्विनी भिडे, पं. व्यंकटेश कुमार, कैवल्य कुमार गुरव, नागेश आडगावकर, यशस्वी सरपोतदार, संजीव चिमलगी, उस्ताद फतेह अली खान, मौमिता मित्रा, पिऊ मुखर्जी, वरदा गोडबोले, कौशिकी चक्रवर्ती, पं. संजीव अभ्यंकर, भाई कमलजीत सिंग, मिता पंडित, उस्ताद बिस्मिला खान-शहनाई, उस्ताद अली अकबर खान-सरोद, पं. रवी शंकर, सतार सारंगी उस्ताद विलायत खान आणि उस्ताद मुनीर खान. उस्ताद विलायत खान-सुरबहार, पं. शिवकुमार शर्मा- संतूर, पं. हरिप्रसाद चौरसिया-बासरी, पं. निखिल बॅनर्जी, पं. कुशल दास-सतार, कल रामनाथन व्हायोलिन, अभिषेक लाहिरी सरोद.

●मराठी

'रामा रघुनंदना', गायिका आशा भोसले, संगीत दत्ता डावजेकर

'जायचे इथून दूर काहूर मनी', गायिका-ज्योत्स्ना मोहिले, नाटक हे बंध रेशमाचे

●बिलासखानी रागपर आधारित एक मेरा ही गीत मैंने 2018 में स्वरबद्ध किया था। वह स्पोंटिफाय (spotify) युट्युब (youtube) के साथ बाकी सभी ऑडिओ प्लॅटफॉर्म पर यह गीत उपलब्ध है। अल्बम का शीर्षक है 'रे मना!

https://youtu.be/kCYnWcTeP50?si=Z O3dExdJGcQKDS9

रे मना, तुज काय झाले सांग ना। 

का असा छळतो जीवाला सांग ना।


हारण्याचीही मजा घे एकदा 

जिंकुनी तुज काय मिळते सांग ना।


हासुनी हसवायचा हा मंत्र घे

दुःख का कुरवळतो तू सांग ना। 


सूर लावून गुणगुणावे गीत है 

ते नि तू का वेगळा रे सांग ना।


गीत/संगीत सुधाकर कदम 

गायक- मयूर महाजन


(हिंदी अनुवादः डॉ. आरती मोने)

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अखिल भारतीय गांधर्व महाविद्यालय मंडल प्रकाशन

'संगीत कला विहार' फरवरी-मार्च २०२६


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